Hinduism vs Buddhism: which is older

भारत अलग-अलग धर्मों से भरा हुआ देश है लेकिन जैसे हम बॉर्डर पर चाइना और पाकिस्तान से लड़ते हैं वैसे ही देश के अंदर आपस में और इसीलिए स्वर्गीय सीडीएस विपिन रावत जी से 2.5 फ्रंट वॉर कहते थे तो दो फ्रंट तो चाइना और पाकिस्तान हो गए लेकिन आधा फ्रंट है आंतरिक कला और इस आंतरिक कला ने देश को चाइना और पाकिस्तान से ज्यादा नुकसान पहुंचाया है जहां हिंदू मुस्लिम रिफ्ट एक कांस्टेंटली फंडेड सिचुएशन है वहीं आए दिन सिखों और हिंदुओं में कलह होती दिखाई देती है और अभी एक नई कलह शुरू हुई है हिंदू वर्सेस बौद्ध। विवाद ज्यादातर इस बात पर होता है कि कौन सा धर्म ज्यादा पुराना है हिंदू धर्म ज्यादा पुराना है या बौद्ध धर्म पुराना है किसने किस पर अत्याचार किया है किसने किसका ज्ञान चुराया है तो इस तरह के जो मतभेद उठते हैं उनके पीछे की सच्चाई क्या है हम बिना बायस हुए इस आर्टिकल में पढ़ेंगे तो चलिए बिना किसी विलंब के आज की वीडियो को प्रारंभ करते हैं


अब साथियों जो बौद्ध धर्म के नए फॉलोअर्स हैं वो ये क्लेम करते हैं कि बौद्ध धर्म सनातन हिंदू धर्म से ज्यादा पुराना है लेकिन वहीं वो दूसरी तरफ ये भी क्लेम करते हैं कि जो हिंदू धर्म के ब्राह्मण थे वो बौद्ध संन्यासी पर अत्याचार करते थे और इसीलिए बौद्ध धर्म एक धार्मिक सुधार के रूप में जन्म लिया अब जब ये हिंदू सनातन धर्म पहले था ही नहीं तो ये ब्राह्मण कहां से आ गए और ये बौद्ध धर्म पर अत्याचार कैसे करने लगे तो आप देख सकते हैं कि जो इनके आर्गुमेंट होते हैं वो खुद में ही कॉन्फ्लेटिंग होते हैं कंट्रा इक्स के साथ आते हैं तो इस तरह का क्लेम करने वाले लोग दो नामों पर सवार दिखते हैं लेकिन यहां पर बहुत से लोग ये भी कह सकते हैं कि बौद्ध धर्म पहले से ही था बाद में हिंदू सनातन धर्म आया और चूंकि हिंदू सनातन धर्म को ऐसा लगा कि बौद्ध धर्म एक थ्रेट है इनकी फिलॉसफी इस पर और इस वजह से सनातन धर्म चारों ओर नहीं फैल पाएगा इसलिए बौद्ध धर्म पर अत्याचार करने लगे तो इस आर्टिकल में हम अन बायस होकर इस चीज पर एक रिसर्च करेंगे और देखने का प्रयास करेंगे कि इन बातों में कितनी सच्चाई है इसके लिए हम हिस्टोरिकल हो आर्कियोलॉजिकल हो या फिर लिटरेरी रेफरेंसेस हो यह सभी हम खंगा लेंगे और देखने का प्रयास करेंगे कि बौद्ध धर्म पहले आया या सनातन धर्म

सनातन धर्म बौद्ध धर्म से पुराना है वो यह है कि बौद्ध धर्म ग्रंथों में वेदों का वर्णन मिलता है मैं कुछ एग्जांपल्स भी आपको दूंगा पहला एक एग्जांपल हम लेते हैं 33 करोड़ देवी देवताओं का आप अक्सर देखते होंगे जो निरादर करने वाले लोग हैं वो यह बातें बताते हैं कि हिंदू धर्म में तो 33 करोड़ देवता हैं जबकि हमें पता है कि वो 33 करोड़ देवता नहीं है वो 33 कोटि देवताओं की बात हुई है जो कि हमें वेदों में बार-बार बताया जाता है लेकिन इसका उल्लेख भी आप बौद्ध धर्म ग्रंथों में देख सकते हैं बौद्ध धर्म के "सूत पिटक के मंजि निकाय के कंकट थला सूत में कौशल के राजा प्रसन चित जिनको त्रिपिट कों में पसंदी नाम से भी उल्लेखित किया गया है उनके पुत्र विडव और गौतम बुद्ध जी के एक शिष्य थे आनंद इनके बीच 33 कोटि देवी देवताओं के विषय में बात की गई है यहां पर ये दोनों आपस में डिस्कस करते हैं ये जो देवी देवता हैं 33 कोट क्या ये मृत्यु को कभी प्राप्त हो सकते हैं या फिर ये अमर हैं इसी के साथ-साथ अगर आप इस ग्रंथ को आगे पढ़ेंगे तो आपको सनातन धर्म के चतुर्वर्ण का उल्लेख भी देखने को मिलेगा" अब यहां पर जो नए फॉलोअर्स हैं बौद्ध धर्म के वो ये भी कह सकते हैं कि जो वर्ण व्यवस्था है या 33 कोटि देवी देवताओं कांसेप्ट है ये तो बौद्ध धर्म में था ही इसको हिंदुओं ने चुरा लिया और फिर उसको विकृत कर दिया पर ऐसा नहीं है अगर आप इस सूत्र को आगे पढ़ेंगे तो "राजा प्रसेनजित जो है वो गौतम बुद्ध जी से ब्राह्मणों और क्षत्रियों को मिलने वाली जो बेटर हॉस्पिटैलिटी है उसके विषय में बात कर रहे हैं और उसकी निंदा कर रहे हैं" तो इससे हमें पता चलता है कि गौतम बुद्ध जी के समय तक वर्ण आधारित भेदभाव शुरू हो गया था और इस पर गौतम बुद्ध जी एक लॉजिकल आंसर भी देते हैं कि "अगर कोई व्यक्ति है चाहे वो साल की लकड़ी से आग जलाए या चंदन की लकड़ी से आग जलाए या फिर आम की लकड़ी से आग जलाए आग तो एक ही प्राप्त होगी उसकी ऊष्मा और रंग में कोई अंतर नहीं रहेगा और इसीलिए जो गुणी व्यक्ति है वो चाहे किसी भी वर्ण का हो उसे उतनी ही रिस्पेक्ट और हॉस्पिटैलिटी मिलनी चाहिए उसके वर्ण पर यह आधारित नहीं होना चाहिए" तो यहां पर साफ-साफ गौतम बुद्ध जी ने जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था का विरोध किया है तो अगर हम लॉजिकली सोचे अगर बौद्ध धर्म में वर्ण व्यवस्था होती तो गौतम बुद्ध जी ही उसका क्यों विरोध करते अगर गौतम बुद्ध जी से ही बौद्ध धर्म आया है तो बौद्ध धर्म वर्ण व्यवस्था को क्यों आगे बढ़ाएगा तो इसका मतलब यह है कि वर्ण व्यवस्था पहले से ही थी और वर्ण व्यवस्था अगर पहले से थी तो इसका मतलब यह है कि सनातन धर्म बौद्ध धर्म से पहले से था और साथियों इतना ही नहीं जो बौद्ध धर्म के त्रिपिटक ग्रंथ हैं अगर आप उनको पढ़ेंगे तो उसमें आप वेदों के नाम और वैदिक ऋषियों के नाम भी पाएंगे

अब साथियों सनातन धर्म और बौद्ध धर्म की क्रोनोलॉजी को लेकर जितने भी डाउट्स हैं वो इस चैप्टर के बाद क्लियर हो जाएंगे यदि आप बौद्ध ग्रंथ सूत पिटक के मंजम निकाय के सेल सूत्र को पढ़े तो वहां पर हमें सेल नाम के एक ब्राह्मण के विषय में पता चलता है अब यहां पर इंटरेस्टिंग बात ये है कि इस ब्राह्मण को तीन वेदों का ज्ञाता बताया गया है साथ में ये भी बताया गया है कि जो वेदांग हैं छह वेदांग हमें पता होंगे शिक्षा कल्प व्याकरण निरुक्त छंद और ज्योतिष्य तो इन सभी छह वेदांग में उस सेल ब्राह्मण को पारंगत बताया गया है और यहां पर ये भी बताया गया है कि ये जो सेल ब्राह्मण हैं वो 300 और ब्राह्मणों को वैदिक मंत्र की शिक्षा दे रहे हैं तो इससे पता चलता है कि जो वैदिक धर्म था वो बौद्ध धर्म के पहले से था और अभी बहुत ढेर सारी एविडेंसेस हैं अगर आप इसी अध्याय में आगे जाएंगे तो एक मंक हैं किड़िया नाम के उन्होंने गौतम बुद्ध से वार्तालाप की है और वहां पर डिस्कशन हुआ है कि वैदिक मंत्रों में जो सावित्री मंत्र है वो सबसे उत्कृष्ट मंत्र है और यहां पर गौतम बुद्ध जी इस बात से एग्री करते हुए भी दिखाए गए हैं साथियों इसके बाद अगर आप त्रिपिट कों को देखेंगे तो वहां पर भी वैदिक ऋषियों के नाम बताया गए हैं इसी सत पिटक के मंजम निकाय में एक चंकी सूत आता है अगर आप उसको पढ़ें तो वहां पर एक 16 वर्षीय ब्राह्मण होता है काप दिक उससे गौतम बुद्ध जी वार्तालाप करते हैं और वहां पर कई वैदिक ऋषियों के नाम पर चर्चा करते हैं और यहीं पर आपको एक इंटरेस्टिंग चीज देखने को मिलेगी जिसके बाद आपके सारे डाउट्स क्लियर हो जाएंगे यहां पर गौतम बुद्ध जी उस ब्राह्मण से प्रश्न करते हैं कि ये जो वैदिक ऋषि हैं जो इतनी जनरेशन से वैदिक मंत्रों का जाप करते आ रहे हैं क्या किसी ब्राह्मण ने उन पर प्रश्न उठाया है कि जो वो करते आ रहे हैं वही एब्सलूट ट्रुथ है या कुछ और है तो यहां पर गौतम बुद्ध जी साफ-साफ बता रहे हैं कि वैदिक ऋषि कई जनरेशन से आ रहे हैं और मंत्रों का जाप कर रहे हैं जिसका अर्थ है कि गौतम बुद्ध जी के पहले भी वैदिक धर्म प्रतिष्ठित था और यहीं पर व कई वैदिक ऋषियों का नाम भी लेते हैं जैसे अष्टक वामदेव विश्वामित्र जमदग्नि अंगी रस भारद्वाज वशिष्ठ कश्यप और भृगु ये सब के सब वैदिक ऋषि हैं अब यहां पर जो नए फॉलोअर्स हैं बौद्ध धर्म के वो ये भी कह सकते हैं कि ये वैदिक ऋषि काल्पनिक हो सकते हैं ये जो नया हिंदू सनातन धर्म बना इन्होंने वैदिक ऋषियों को काल्पनिक रूप से मान लिया कि उन्होंने कुछ देखा है दृष्ट किया है मंत्रों के दृष्टा हैं और फिर उस पर चर्चा यहां पर गौतम बुद्ध जी कर रहे हैं उस पर प्रश्न उठा रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है गौतम बुद्ध जी आगे ये भी कहते हैं कि ना तो आज के जो ब्राह्मण हैं उनसे मुझे पता चलता है कि क्या एब्सलूट ट्रुथ है और ना ही आज से जो सात जनरेशन पहले से ब्राह्मण आ रहे हैं जो वैदिक मुनि आ रहे हैं उनसे भी नहीं पता चलता कि एब्सलूट ट्रुथ क्या है और ना ही वैदिक मंत्रों के दृष्टा जो हैं वो दृष्टा की बात तीसरी बार करते हैं कि मतलब आज के जनरेशन के ब्राह्मण सात जनरेशन पहले से जो ब्राह्मण आ रहे हैं और उसके पहले जो वैदिक मंत्रों के दृष्टा हैं वो तो दृष्टा को आप काल्पनिक भी मान सकते हैं अगर आप फॉलोअर हैं बौद्ध धर्म के और काल्पनिक मानना चाहते हैं तो मान सकते हैं लेकिन वो सात जनरेशन की बात यहां पर करते हैं तो इस फैक्ट से इतना तो माना जा सकता है कि सनातन धर्म एटलीस्ट सात जनरेशन बौद्ध धर्म से पुराना है तो साथियों मैं आशा करता हूं कि इन एविडेंसेस के माध्यम से आपको इतना तो पता चल गया होगा कि सनातन धर्म पुराना है या फिर बौद्ध धर्म और जो नए फॉलोअर्स हैं बौद्ध धर्म के जो ये कहते हैं कि वेद 15वीं या 14वीं शताब्दी में लिखे गए हैं तो अगर वेद 14वीं 15वीं शताब्दी में लिखे गए हैं तो कम से कम उसकी सात जनरेशन बाद गौतम बुद्ध जी आए तो इसका मतलब यह है कि उसके 300 400 साल बाद यानी 18वीं सदी या 19वीं सदी में बौद्ध धर्म का जन्म हुआ होगा और ये बताता है कि इनकी सोच कितनी बेसलेस है तो साथियों यहां पर एक चीज तो क्लियर हो गई कि सनातन धर्म बौद्ध धर्म के पहले से था लेकिन एक दूसरी चीज भी है जो ये बार-बार क्लेम करते हैं कि सनातन धर्म के जो ब्राह्मण हैं जो ब्राह्मणवाद था उन्होंने बौद्ध धर्म पर और बौद्ध धर्म के अनुयायियों पर भिक्षुओं पर बहुत अत्याचार किया है बहुत ढेर सारा भेदभाव किया है और वो यहां तक भी कहते हैं कि जो हिंदू राजा थे वो बौद्ध धर्म के अनुयायियों पर नरसंहार करते थे उनको मारते काटते थे और ये अधिकतर क्लेम बौद्ध ग्रंथों के आधार पर किया जाता है तो आइए देखते हैं कि बौद्ध धर्म ग्रंथ कितने रिलायबल हैं

साथियों उपनिषद हों या फिर गौतम बुद्ध की शिक्षाएं ये सभी हमें लौकिक कर्मकांड से ऊपर उठाती हैं और ज्ञान के माध्यम से नॉलेज के माध्यम से जीवन में हमें बड़े लक्ष्यों की तरफ बढ़ाती हैं हम भारत के प्राचीन दर्शनों और उपनिषदों को अपने शिक्षण मैप पर पढ़ाते हैं इनमें से कुछ कोर्सेस फ्री हैं जिससे आप समझ पाएं कि मैं आपको कैसा पढ़ा रहा हूं और साथ में आपको यह भी पता चल जाएगा कि आपके इन विषयों में रुचि कितनी है और अगर आपको इंटरेस्ट बढ़ता है और आपको डिटेल कोर्सेस लेने हैं तो आप पेड कोर्सेस में इनरोल कर सकते हैं ये सभी के सभी रिकॉर्डेड वीडियोस के फॉर्मेट में है जो आपको लाइफ टाइम के लिए अवेलेबल कराए जाते हैं और अगर इन कोर्सेस के बीच में आपको कोई प्रश्न होता है कोई समस्या आती है तो हम व्हाट्सएप के माध्यम से उसका उत्तर भी देते हैं तो यदि आप हाइपर क्वेस्ट की वीडियोस को देखते हैं तो आप आज ही जुड़े हमारा आपको पूरा सपोर्ट रहेगा लिंक आपको नीचे कमेंट सेक्शन और डिस्क्रिप्शन बॉक्स में मिल जाएगी साथियों अब आइए बौद्ध स्क्रिप्चर की तरफ बढ़ते हैं और देखते हैं कि वो कितने रिलायबल हैं साथियों जैसे हमारे सनातन धर्म में पुराण ग्रंथ हैं तो पुराणों की हर एक बात को लिटरल नहीं लिया जाता है पुराणों में बहुत ढेर सारी ऐसी भी बातें हैं ऐसी भी कथाएं हैं जो सिंबॉलिक होती हैं और अपनी सिंबॉलिज्म के माध्यम से कई तरह की शिक्षाओं को कई तरह के ज्ञान को आगे बढ़ाती हैं लेकिन इसी के साथ-साथ पुराणों में बहुत ढेर सारे ऐतिहासिक प्रमाण भी होते हैं जैसे हमारी प्राचीन काल की अर्थव्यवस्था कैसी थी राजनीति कैसी थी लोग कैसे रहते थे क्या खाते थे क्या पीते थे उसके साथ-साथ जो हमारे देश का भौगोलिक इतिहास था कि पर्वत कौन से थे कौन सी नदियां थी इस तरह के ऐतिहासिक प्रमाण भी मिलते हैं ऐसे ही जब आप बौद्ध ग्रंथों को देखते हैं तो बौद्ध ग्रंथों में भी हमारे भारत देश का इतिहास मिलता है लेकिन वहां पर भी लिखी हुई हर एक बात ऐतिहासिक प्रमाण नहीं होती है जिस प्रकार से पुराणों की बातें इसके लिए मैं आपको एक छोटा सा एग्जांपल देता हूं अगर आप देखें तो बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए सम्राट अशोक का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है उनका नाम बौद्ध इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा गया है अब यहीं पर बहुत ढेर सारे बौद्ध ग्रंथ है जैसे दिव्या वदान ग्रंथ हो गया या सिंघली अनुश्रुतियां हो गई यह बताती हैं कि जो सम्राट अशोक थे ये अपने 99 भाइयों की हत्या करके राजगद्दी पर चढ़े थे लेकिन अगर आप इसको हिस्टॉरिकली देखेंगे तो एक अतिशयोक्ति है ऐसा नहीं हुआ था इसका प्रमाण हमें सम्राट अशोक के पांचवें अभिलेख में मिलता है जहां पर उनके जीवित भाइयों और परिवार का उल्लेख दिया गया है उनके अभिलेखों से यह भी पता चलता है कि उनके शासन के 13वें वर्ष में उनके कई भाई-बहन जिंदा थे और उनके साम्राज्य के अलग-अलग भागों में रहते थे उनमें से कुछ भाई तो अलग अलग भागों के उप राजा भी थे ऐसे ही अगर आप बौद्ध ग्रंथों को देखेंगे तो वहां पर बताया जाता है कि सम्राट अशोक ने जब बौद्ध धर्म को अपनाया तो उससे पहले वो बहुत निर्दय थे बहुत अत्याचारी थे और हिंसात्मक थे इसलिए बौद्ध धर्म को अपनाने से पहले जो भी सम्राट अशोक का विवरण मिलता है वहां पर उनको चंड अशोक कहा गया है जो कि इतिहासकारों में विवादास्पद है इतिहासकार मानते हैं कि बौद्ध धर्म ने अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए सम्राट अशोक के जो पहले का जीवन है बौद्ध धर्म को अपनाने से पहले का जीवन उसके विषय में बहुत ढेर सारी अनर्गल बातें लिखी हैं हम इसको अनर्गल बातें नहीं कहेंगे लेकिन हम इसको अतिशयोक्ति कहेंगे ये अतिशयोक्ति ग्रंथों में बहुत देखने को मिलती है क्योंकि अगर आप देखें तो सच्चाई तो यही है कि जो सम्राट अशोक थे वो पहले शैव उपासक थे और फिर उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया था यह राजतरंगिणी में भी दिया गया है तो इसमें कोई शक नहीं है कि सम्राट अशोक पहले वैदिक धर्म के अनुयाई थे लेकिन बाद में उनको बौद्ध धर्म की ओर आकर्षण हुआ और इस वजह से वो बौद्ध धर्म के अनुयाई बन गए अब यहां पर अगर आप देखें कि सम्राट अशोक को किसने बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी तो इसको भी लेकर बहुत ढेर सारा मतभेद है इनफैक्ट बौद्ध धर्म के अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग बातें लिखी गई हैं इसमें बताया गया है कि सम्राट अशोक अपने शासन के चौथे साल में एक निग्रोथ नाम के बौद्ध भिक्षु से जो कि 7 वर्ष के थे उनसे बौद्ध धर्म की दीक्षा लिए थे वहीं अगर आप बौद्ध ग्रंथ दिव्या अवदान को पढ़ेंगे तो वहां पर इस बात का श्रेय उपगुप्ता नाम के एक बौद्ध भिक्षु को दिया जाता है अब अगर हम सम्राट अशोक के अभिलेखों को देखें तो 13वें शिलालेख में उनके बौद्ध होने का संबंध कलिंग युद्ध से जोड़ा जाता है और अगर हम कलिंग युद्ध को देखें तो उनके शासनकाल के चौथे वर्ष नहीं बल्कि आठवें वर्ष में हुआ था तो जो भी ऐतिहासिक प्रमाण है हमारे पास खासकर अभिलेखों का वो बौद्ध धर्म ग्रंथों से मैच नहीं करता है जिसका मतलब है कि बौद्ध धर्म ग्रंथों को ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में लेने से पहले हमें कई बार सोचना चाहिए अगर आप इतिहासकारों की माने तो वो मानते हैं कि सम्राट अशोक बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित थे और जब कलिंग युद्ध हुआ और उन्होंने भयावह रक्तपात देखा तो उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया तो साथियों हमने इस सेक्शन में देखा कि किस प्रकार से जो बौद्ध धर्म ग्रंथ हमें बताते हैं हमारे इतिहास के बारे में वो इतना हमारे इतिहास से मिलता-जुलता नहीं है जैसे हमें पुराणों में अति शोक्ति देखने को मिलती है वैसे जो बौद्ध धर्म ग्रंथ है जो इतिहास का प्रमाण देते हैं उनमें भी हमें अतिशयोक्ति देखने को मिलती है अब साथियों हम ऐतिहासिक साक्ष्य के बेसिस पर यह देखने का प्रयास करेंगे कि क्या वाकई में हिंदू राजाओं ने बौद्ध धर्म पर अत्याचार किया था

अब साथियों बौद्ध धर्म के जो नए फॉलोअर्स हैं जो ये क्लेम करते हैं कि हिंदू राजाओं ने बौद्ध धर्म पर अत्याचार किया वो सबसे ज्यादा टारगेट करते हैं पुष्यमित्र शुंग को क्योंकि जो बौद्ध धर्म ग्रंथ है दिव्या अवदान वहां बताया गया है कि एक बार पुष्यमित्र शुंग ने लोगों से पूछा कि सम्राट अशोक की प्रसिद्धि का क्या कारण है तो लोगों ने बताया कि सम्राट अशोक ने 84000 स्तूप का निर्माण किया है इसलिए वो प्रसिद्ध हैं और वहीं पर पुष्यमित्र सुंग ने कहा कि मैं इन 84000 स्तूप को नष्ट करके प्रसिद्धि प्राप्त करूंगा और उसके बाद पुष्यमित्र सुंग ने उसके रास्ते में आने वाले हर एक स्तूप को नष्ट कर दिया और यह ऐलान करा दिया कि जो भी मुझे बौद्ध भिक्षुओं का सर देगा तो हर एक सर के बदले मैं 100 दिनारे दूंगा तो यह बौद्ध धर्म ग्रंथ दिव्या अवदान में लिखा है लेकिन इसकी पुष्टि 16वीं शताब्दी के एक तिब्बती इतिहासकार तारा नाथ जी करते हैं लेकिन साथियों आप पहले भी देख चुके हैं कि दिव्या अवदान जैसे बौद्ध धर्म ग्रंथ बहुत ढेर सारी अतिशयोक्ति के साथ आते हैं अब अगर आप इसके असली इतिहास में जाएंगे तो जहां पुष्यमित्र सुंग को बताया जा रहा है कि इन्होंने सभी स्तूप का नाश कर दिया वहीं पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में दो स्तूप का निर्माण भी हुआ था जो बौद्ध धर्म के सबसे महत्त्वपूर्ण स्तूप है सांची का स्तूप और भरहुत का स्तूप भरहुत के स्तूप के एक रेलिंग में खुदा भी हुआ है 'शुंग रंजे' यानी कि शुंग काल में निर्मित जिसका अर्थ होता है शुंगों के राज्य काल में और इस बात की पुष्टि करते हुए एक आर्ट हिस्टोरियन हुए हैवल वो भी यही बताते हैं कि जो सांची का स्तूप है या फिर भरहुत का स्तूप है इसको बनने में कम से कम 100 साल लगा होगा और यह शुंग शासनकाल में ही बना है तो चूंकि पुष्यमित्र लगभग 30 से 40 साल तक राज्य किए तो आप उनको एक्सक्लूड नहीं कर सकते हैं तो ये जो स्तूप बने हैं ये पुष्यमित्र सुंग के ही समय में बने हुए हैं तो इससे हम पुष्यमित्र सुंग को बौद्ध धर्म के खिलाफ असहिष्णु नहीं बता सकते हां कुछ रिपोर्ट्स और हैं जैसे आप इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के एंशिएंट इंडियन हिस्ट्री के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर जी आर शर्मा की रिसर्च को पढ़ें तो उन्होंने बताया कि ऐसे भी स्थान हैं ऐसे भी स्तूप मिले हैं जहां पर हमें विनाश और जलाए जाने के प्रतीक चिन्ह मिले हैं और वो भी शुंग काल में ही हुए हैं तो पुष्यमित्र शुंग की असहिष्णुता को भी दिखाता है तो हमें दो कंट्रा डिक्टिंग चीजें देखने को मिलती हैं जहां हमें देखने को मिलता है कि पुष्यमित्र शुंग ने कुछ बौद्ध स्तूप को जलाने का प्रयास भी किया है लेकिन उसी के काल में कुछ बौद्ध स्तूप बने भी हैं तो यहां पर ये जो कंट्रा डिक्टिंग चीज है आइए उसको समझते हैं साथियों हिस्टोरियन केपी जैसवाल अपने जर्नल ऑफ बिहार एंड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी में लिखते हैं कि जो पुष्यमित्र शुंग था उसने अपने पिछले मौर्य राजा बृहद्रथ का वध किया था और फिर राजा बना था और जहां बृहद्रथ के समय में बौद्ध धर्म को आश्रय मिला हुआ था वहीं पर जब ये राजा बने पुष्यमित्र शुंग तो इन्होंने वैदिक धर्म को दोबारा आश्रय दिया जिससे ये बात बिल्कुल संभव हो सकती है कि बहुत ढेर सारे बौद्ध भिक्षुओं ने जो विरोधी राजा थे या ग्रीक राजा थे उनके साथ अपना रिलेशन बढ़ा लिया हो तो इसके बाद पुष्यमित्र शुंग ने अपने राज्य की आंतरिक सुरक्षा के लिए इन बौद्ध भिक्षु जो दूसरे राजा से मिल गए हैं उन देशद्रोहियों का वध करने के लिए पुरस्कार की घोषणा की हो तो ये पॉलिटिकल रीजन से बौद्ध भिक्षुओं के खिलाफ कोई घोषणा हो सकती है लेकिन इसमें कोई धार्मिक पर्सपेक्टिव नहीं था क्योंकि अगर आप बौद्ध धर्म ग्रंथ दिव्या अवदान को पूरा पढ़ते हैं तो जहां पर ये बताया जाता है कि पुष्यमित्र सुंग बौद्ध धर्म के संहारक थे वहीं यह भी बताया जाता है कि बहुत ढेर सारे बौद्ध भिक्षु उनके मंत्री के रूप में नियुक्त भी थे साथियों अगर आप इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो ऐसे बहुत ढेर सारे हिंदू राजा भी हुए हैं जैसे हर्षवर्धन और इन सभी राजाओं ने हिंदू होते हुए भी बौद्ध धर्म को आश्रय प्रदान किया उदाहरण के लिए अगर आप अजंता एलोरा की केव्स देखें तो वहां पर हमें बहुत ढेर सारी बौद्ध और जैन केव आर्ट्स देखने को मिलती हैं तो इसका भी संरक्षण हिंदू राजाओं ने उतना ही किया जितना बौद्ध और जैन राजाओं ने लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि हम पूरी तरह से यह बात को नकार दें कि हिंदू राजा ने बौद्ध धर्म पर अत्याचार नहीं किया है इसका एक इंसिडेंट हमें देखने को मिलता है जहां पर एक हिंदू राजा ने बौद्ध धर्म की एक इंपॉर्टेंट साइट पर हमला किया और उसे तोड़ दिया वो था बंगाल का राजा राजा शशांक जो सेवंथ सेंचुरी में बंगाल का शासक बना था और इस राजा शशांक ने बोधगया में बोधि वृक्ष को उखड़वा दिया था लेकिन ये इकलौता ऐसा इंसिडेंट है जो हजारों सालों के इतिहास में मिलता है जहां पर बौद्ध भिक्षुओं को केवल इस बात पर पर्सीक्यूशन झेलना पड़ता है कि वो बुद्ध के अनुयाई थे इसके अलावा इस प्रकार का कोई भी विवरण हमें नहीं मिलता है भारत हमेशा से एक स्पिरिचुअल सहिष्णु देश रहा है यहां पर सभी धर्म एक साथ फले फूले हैं लेकिन आज भी कई लोग एक्सेप्शन को पकड़कर फॉल्ट लाइंस क्रिएट करते हैं और एक दूसरे के बीच में दरारें डालते हैं इसलिए हमें सतर्क रहना चाहिए और जो मैंने 2.5 फ्रंट वॉर की बात की थी उसमें से कम से कम हम .5 को तो हटा ही सकते हैं इसलिए हमें अपनी आंतरिक कलह से बचना चाहिए बाहर के जो विदेशी ताकतें हैं जो विदेशी दुश्मन है उनसे तो हम लड़ेंगे ही कम से कम हम अपने देश में अपने साथियों के साथ हमें नहीं लड़ना चाहिए साथियों मैं आशा करता हूं कि इस वीडियो के माध्यम से जो क्रोनोलॉजी है सनातन धर्म और बौद्ध धर्म की आपको समझ में आई होगी और जो ये क्लेम किया जाता है कि बौद्ध धर्म पर बहुत ढेर सारा अत्याचार हुआ है और बौद्ध धर्म बहुत पुराना धर्म है सनातन धर्म से भी पुराना उस पर आपके डाउट्स क्लियर हुए होंगे साथियों हम भगवान बुद्ध की शिक्षाओं पर उनके फिलॉसफी पर अगली वीडियो करने वाले हैं वहां पर हम बौद्ध धर्म की बेसिक फिलॉसफी को बहुत ही डिटेल में समझेंगे और अगर आपको उपनिषदों की फिलॉसफी हो गई या फिर हिंदू दर्शन समझने हैं तो आप हमारे शिक्षणम ऐप पर जुड़ सकते हैं वहां पर मैं डिटेल में भारतीय दर्शनों को और उपनिषदों को पढ़ाता हूं साथियों मैं रिक्वेस्ट करूंगा कि इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा लोगों में अपने परिवार जनों में और दोस्तों में साझा करें जिससे हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म के बीच में जो डाउट बना रहता है वो दूर हो और अगर आपको बौद्ध धर्म पर और भी वीडियोस देखनी है तो मैंने एक बौद्ध धर्म के शून्यवाद पर वीडियो बनाई थी आप उसको भी देख सकते हैं और इसके बाद भी हम बौद्ध धर्म की और भी फिलॉसफी पर वीडियोस लाने वाले हैं साथियों मैं इसी के साथ इस टॉपिक को इस विषय को यहीं पर दूंगा विराम अब मैं मिलूंगा एक नए टॉपिक के साथ नई वीडियो में तब तक के लिए जय श्री राम।

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