The Controversial Story of Brahma and Saraswati DEBUNKED !

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेसर रेप और यौन ऑफेंसेस पर लेक्चर देते हुए स्टूडेंट को पढ़ाते हैं कि रेप की शुरुआत हिंदू भगवान ब्रह्मा ने की थी जब उन्होंने अपनी ही बेटी सरस्वती के साथ जोर-जबरदस्ती की। इंटरनेट पर ऐसे ही हजारों लोग ब्लॉग्स, आर्टिकल्स और ट्विटर पर चीख-चीख कर मां सरस्वती के लिए इंसाफ मांगते नजर आते हैं। ये सनातन हिंदू धर्म को रेप कल्चर का जनक बताएंगे और प्रमाण के नाम पर आपको हिंदू ग्रंथों की कथाओं की छोटी सी कटिंग या बाबा भीमराव अंबेडकर की 'रिडल्स इन हिंदुइज्म' किताब के पन्ने थमा देंगे, जिसमें न केवल ब्रह्मा जी को मां सरस्वती जी का बलात्कारी बताया गया है, बल्कि राम जी को सीता जी का भाई भी इसी पुस्तक में श्री राम जी के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स का भी बात कहा है। लव-कुश को रावण का बेटा बोला गया है और श्री राम जी को शराबी और मांसाहारी बताकर अपमानित भी किया गया है। बाबा जी का क्रोध सनातन धर्म के प्रति जगजाहिर था और उनके पास इन सभी तथ्यों के प्रमाण के नाम पर विदेशी ट्रांसलेशन और बौद्ध रामायण के अलावा कुछ था भी नहीं। वो मैक्स मूलर के दीवाने थे, ये वही मैक्स मूलर है जो अपनी पत्नी को लिखते हैं कि मैंने वेदों का नया एडिशन तैयार किया है, ये वेद भारतीयों के मूल रहे हैं हमें इसे ही उखाड़ फेंकना होगा। एक दूसरे लेटर में यही मैक्स मूलर लिखते हैं कि भारत की एजुकेशन को डिस्ट्रॉय करके ही हम क्रिश्चियनिटी और वेस्टर्न वर्ल्ड को भारत में एस्टेब्लिश कर पाएंगे और आज कर भी लिया है। अब देश के प्रतिष्ठित अद्भुत प्रतिभा के धनी बाबा साहेब ही ऐसे देश के दुश्मनों को सपोर्ट करेंगे तो सब कुछ ये संभव है।


दोस्तों, सनातन धर्म पर कीचड़ उछालने का खेल कोई नया नहीं है। आपको बार-बार बताया जाएगा कि ब्रह्मा जी ने अपनी ही बेटी मां सरस्वती के साथ जोर-जबरदस्ती की। आपको आर्टिकल्स मिल जाएंगे, क्लिपिंग्स मिल जाएंगी, किताबें मिल जाएंगी जहां पर यह लगातार अपमान होता रहेगा, लेकिन आप एक बार भी प्रयास नहीं करेंगे अपनी कथाओं को पूरा पढ़ने का। तो इस आर्काटिकल का यही उद्देश्य है कि आप तक इस प्रकरण से संबंधित सत्य को पहुंचाया जाए ताकि आप हिंदू होते हुए भी इन सब चीजों के बहकावे में आकर और भावनाओं में बहकर सनातन धर्म को निजात का प्रतीक न मान लें।

दोस्तों, जो कोई आर्गुमेंट देते हैं कि कैसे भगवान ने अपनी बेटी से ही विवाह कर लिया, वो आपके सामने "श्रीमद् भागवत महापुराण के तृतीय स्कंद के 12वें अध्याय" का यह छोटा सा हिस्सा प्रस्तुत करते हैं जहां पर लिखा है कि "भगवान ब्रह्मा की कन्या सरस्वती बड़ी ही सुकुमारी और मनोहर थी, हमने सुना है एक बार उसे देखकर ब्रह्मा जी काम-मोहित हो गए थे यद्यपि वह स्वयं वासनाहीन थी।" अब दोस्तों, आपको इतना ही दिखाया जाएगा और आपसे बार-बार बोला जाएगा कि देखो तुम्हारे भगवान कितने बेशर्म हैं, वो अपनी बेटी के ही पीछे पड़ गए और उससे विवाह कर लिया। अब आपको न तो इसके आगे का पता होगा और न पीछे का, और इसी वजह से आपका शर्मिंदगी से मुंह बंद हो जाता है। लेकिन दोस्तों, हम आपको बताएंगे कि कैसे बिना कॉन्टेक्स्ट के आधी-अधूरी जानकारी देकर आपको मूर्ख बनाया जाता है।

तो दोस्तों, सबसे पहले हम यह देख लेते हैं कि श्रीमद् भागवत महापुराण का तृतीय स्कंद का 12वां अध्याय किस विषय पर है। यह जो 12वां अध्याय है, यह ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि के विस्तार का वर्णन करता है। तो यहां इस अध्याय में हम देखते हैं कि कैसे ब्रह्मा जी अपने शरीर से, अपने शरीर के अलग-अलग भागों से अलग-अलग तरह के गुणधर्मों की रचना करते हैं। यहां लिखा है कि प्रजापति ब्रह्मा जी की गोद से दक्ष, अंगूठे से वशिष्ठ, प्राण से भृगु, त्वचा से क्रतु, हाथ से पुलह, नाभि से पुलस्त्य और ऐसे ही आगे विभिन्न तरह की उत्पत्तियों को बताते हुए ये भी बताया गया है कि सरस्वती मां जो थीं, ज्ञान की जो देवी थीं, वो ब्रह्मा जी के मुख से उत्पन्न होती हैं।

अगर आप थोड़ा सा भी वैज्ञानिक या दार्शनिक दृष्टिकोण रखते हैं, तो आपको इतनी तो समझ जरूर होगी कि किसी की त्वचा से, मुख से या अंगूठे से मनुष्य नहीं पैदा हो सकते, ये साइंटिफिक बिल्कुल भी नहीं है। और अगर आप दार्शनिक रूप से देखें तो कार्यकारण में भौतिक रूप तक के सिद्धांत से जिस चीज से जो चीज पैदा होती है उसको वैसे ही दिखाना पड़ता है। अब जैसे शेर का बच्चा घोड़ा नहीं हो सकता, आपके माता-पिता जैसे दिखते हैं वैसे ही आप दिखेंगे, आपके भाई-बहन दिखेंगे, तो ये कार्य और कारण में एकरूपता का सिद्धांत है। इसीलिए अगर अंगूठे से दक्ष पैदा हुए तो दक्ष जी को भी अंगूठे की ही तरह दिखाना पड़ेगा। तो ये सब पौराणिक कथाएं हैं और आपको बहुत गहरे तथ्यों को समझाने के लिए एक साकार पटल पर ले आकर कथाओं के माध्यम से आपको समझाया गया है।

तो जब सृष्टि का आरंभ हो रहा होगा या उसका विस्तार हो रहा होगा, तो भारतीय दर्शनों में ऐसा माना गया है कि एक शक्ति होती है जो अव्यक्त होती है, उसके बाद जब अपने आप को व्यक्त कर देती है तो सृष्टि बनती है। तो अव्यक्त का मतलब होता है 'अनमेनिफेस्टेड फॉर्म' और व्यक्त का मतलब होता है 'मेनिफेस्टेड फॉर्म' यानी कि एक्सप्रेस हो जाना। तो इस बात को, इस दर्शन को इस कथा से बताया गया है कि कोई निराकार शक्ति थी जिसका साकार फॉर्म यहां पर ब्रह्मा जी से लिया गया है और जो नई-नई चीजें उत्पन्न हुईं जैसे कि इंटेलिजेंस हो गई जिसको हम सरस्वती मां बोल रहे हैं या फिर और भी जो चीजें उत्पन्न हो रही हैं, उनको साकार रूप देकर उस तरह से कथा के माध्यम से आपको समझाया जा रहा है।

जैसे अगर आपने सांख्य दर्शन पढ़ा हो, तो वहां पर जब प्रकृति-पुरुष का संयोग होता है तो सबसे पहले जो चीज उत्पन्न होती है वो है महत। महत का अर्थ हो गया इंटेलिजेंस यानी बुद्धि। तो जिस तरह से सांख्य दर्शन में बुद्धि सबसे पहले उत्पन्न हो रही है, वैसे ही ब्रह्मा जी का यहां पर जब सृष्टि विस्तार हो रहा है, सृष्टि का आरंभ हो रहा है, तो बुद्धि की देवी ज्ञान की देवी सरस्वती मां प्रकट होती हैं। तो यहां उत्पन्न हो रही हैं, तो जो 'उत्पन्न' शब्द है यह बहुत महत्वपूर्ण शब्द है क्योंकि इसी से अब्राह्मिक रिलिजन और ब्राह्मिक रिलिजन (जो हमारे धर्म हैं) इनकी फिलॉसफी में डिफरेंस आ जाता है। क्योंकि उत्पन्न शब्द से ज्ञात होता है कि मैथुन धर्म अर्थात संभोग प्रक्रिया का अभी निर्माण नहीं हुआ है। ये सृष्टि निर्माण के प्रारंभ की प्रक्रिया है, अभी यहां पर मनुष्यों का जन्म भी नहीं हुआ है। ये सब कथाएं सृष्टि के निर्माण के समय की हैं जब ब्रह्मा जी क्रिएटर हैं और उनकी क्रिएशन है सरस्वती जी यानी इंटेलिजेंस जिससे सृष्टि का निर्माण होगा। तो यहां पर हम सरस्वती जी को पुत्री जरूर कह देते हैं, डॉटर जरूर कह देते हैं, क्योंकि जो भी क्रिएटर होता है वो एक फादर फिगर की तरह देखा जाता है, लेकिन अगर सत्य अर्थों में देखा जाए तो सरस्वती जी ब्रह्मा जी की पुत्री नहीं हैं, कृति हैं, रचना हैं।

अब जो मैथुन धर्म है या फिर संभोग प्रक्रिया है जो रिप्रोडक्शन करते हैं मनुष्य करते हैं जीव करते हैं, ये इसी अध्याय में बहुत बाद में आया है जहां पर यह कहा गया है - जिस समय यथोचित क्रिया करने वाले श्री ब्रह्मा जी इस प्रकार देव के विषय में विचार कर रहे थे, उसी समय अचानक उनके शरीर के दो भाग हो गए। 'क' ब्रह्मा जी का नाम है, उन्हीं से विभक्त होने के कारण शरीर को 'काय' कहते हैं। उन दोनों विभागों से एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। उनमें जो पुरुष था वह सार्वभौम सम्राट स्वयंभू मनु हुए और जो स्त्री थी वो उनकी महारानी शतरूपा हुई। तब से मैथुन धर्म यानी स्त्री-पुरुष संभोग से प्रजा की वृद्धि होने लगी।

तो देखा जाए कथा के अनुसार मिथुन धर्म शुरू हुआ है मनु और शतरूपा के बाद में, उसके पहले मिथुन धर्म था नहीं। तो इसका अर्थ यह है कि सरस्वती जी प्रकट हुई हैं या उत्पन्न हुई हैं ब्रह्मा जी से। और अगर आप निराकार स्वरूप में देखेंगे तो जो प्रकृति अव्यक्त थी वो व्यक्त होते ही उसने इंटेलिजेंस को व्यक्त कर दिया, एक्सप्रेस कर दिया, तो उस चीज को साकार रूप में ऐसा बताया गया है। इसमें कोई शर्मिंदगी की बात है नहीं। और अगर आप इस फिलॉसफी पर देखें, ये जो पौराणिक फिलॉसफी बताई जा रही है कि एक भाग पुरुष और एक भाग स्त्री में विभक्त हुआ फिर उसके बाद मिथुन धर्म से प्रजा और मैनकाइंड आगे बढ़ा है, ये बहुत बेसिक फिलॉसफी है। ये बहुत उच्च कोटि की फिलॉसफी नहीं है और ये फिलॉसफी मुख्य आधार है अब्राह्मिक रिलिजन का। अगर आप देखें तो वहां पर एडम और ईव की कथा है, वहां पर आदम और हव्वा की कथा है, तो ये तो और भी शर्मसार कर देने वाली कथाएं हैं क्योंकि एक नर और एक नारी से जो संतान उत्पन्न होगी वह भाई-बहन नहीं होगी? और फिर भाई-बहन भी आपस में मिथुन क्रिया करेंगे, संभोग क्रिया करेंगे और फिर सृष्टि का निर्माण होगा? तो इससे बचकानी फिलॉसफी कोई हो नहीं सकती। तो जो आदम-हव्वा की कथा है इसी पर अब्राह्मिक रिलिजन आगे बढ़ता है और इसको मानता है। हिंदू धर्म में तो फिर भी मनु और शतरूपा की कहानी को कथा की तरह देखा जाएगा। और वहां पर ये भी बताया जाता है कि जो उनके बच्चे हुए उन्होंने भी आपस में संभोग किया, उसमें जो एडम का बेटा केन था उसने अपनी ही बहन एवलिन से शादी की और उसके बाद उनसे भी बच्चों को उत्पन्न किया। तो ये अपने धर्म में नहीं देखते हैं और फिर दूसरे के धर्म में उंगली उठाके आपको ही शर्मिंदा करने के लिए चले आएंगे।

तो दोस्तों, आपको समझ में आ गया होगा कि सनातन धर्म में जो पौराणिक फिलॉसफी मनु और शतरूपा की है, ये बहुत प्रसिद्ध फिलॉसफी नहीं है और बहुत उच्च कोटि की फिलॉसफी नहीं है, इसीलिए मिथुन धर्म को बाद में रखा गया है। और जब सृष्टि निर्माण हो रहा था तो उस समय मिथुन धर्म को नहीं रखा गया है क्योंकि उस समय हम बात कर रहे हैं अव्यक्त से व्यक्त होने को, सृष्टि के निर्माण को और उसको फिर हम विभिन्न-विभिन्न देवताओं के माध्यम से बताते हैं। वहां पर मिथुन रिप्रोडक्शन या इंटरकोर्स नहीं होता है।

अब दोस्तों, यहां पर बहुत से लोग प्रश्न ये कर सकते हैं कि जब संभोग नहीं था, इंटरकोर्स नहीं था, तो ब्रह्मा जी फिर काम-मोहित क्यों हो गए? क्योंकि वो तो देवता हैं और फिर जब सृष्टि का निर्माण हो रहा है तो ऐसा क्यों लिखा गया कि ब्रह्मा जी सरस्वती जी पर काम-मोहित हो गए? तो दोस्तों, ये कथा है और इसके माध्यम से समाज को एक शिक्षा दी जाती है। अगर आप आगे के प्रकरण को देखें तो काम-मोहित होने के बाद आपको कभी नहीं बताया जाएगा कि उसके बाद क्या हुआ, ब्रह्मा जी ने क्या किया। इतना ही दिखाकर आपको बोल देंगे कि उन्होंने अपनी बेटी से जोर-जबरदस्ती की। लेकिन इस कथा को आगे पढ़िए, तो आगे कथा में बताते हैं कि जब ब्रह्मा जी को ये काम-वासना हुई तो फिर उनके साथ क्या हुआ।

इसी अध्याय में आगे लिखा हुआ है - "उन्हें ऐसा अधर्म संकल्प करते देख उनके पुत्र मरीचि आदि ऋषियों ने उन्हें विश्वासपूर्वक समझाया: 'पिताजी, आप समर्थ हैं फिर भी अपने मन में उत्पन्न हुए काम के वेग को न रोककर पुत्री-गमन जैसा दुस्तर पाप करने का संकल्प कर रहे हैं।' और फिर आगे बोला गया कि अपने पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियों को अपने सामने इस प्रकार कहते देख प्रजापतियों के पति ब्रह्मा जी बड़े लज्जित हुए और उन्होंने उस शरीर को उसी समय छोड़ दिया, तब उस घोर शरीर को दिशाओं ने ले लिया, वही कोहरा हुआ जिसे अंधकार भी कहते हैं।" तो दोस्तों, इस कथा के माध्यम से यह बताने की कोशिश की जा रही है कि पुत्री-गमन करना तो दूर, उसके बारे में सोचना भी पाप है। इस कथा को जो भी पुरुष पढ़ेगा तो उसको ये शिक्षा मिलेगी कि पुत्री-गमन सबसे बड़ा अपराध होता है, सबसे निकृष्ट कर्म है। और इस अध्याय में कहीं भी ब्रह्मा और सरस्वती जी का विवाह नहीं हुआ है।

लेकिन साथियों, एक दूसरा पुराण है - ब्रह्मवैवर्त पुराण, तो वहां पर ब्रह्मा जी का सरस्वती जी से विवाह हुआ है। लेकिन वो सरस्वती कोई और थी, वो ब्रह्मा जी की पुत्री और ब्रह्मा जी की रचना नहीं थी। उसको भी हम यहां समझेंगे।

अव हम ब्रह्मा जी के जब सगुण स्वरूप की बात करते हैं तो उनके विवाह का एक उल्लेख हमें ब्रह्मवैवर्त पुराण में देखने को मिलता है। यहां पर "अध्याय 35 में स्वयं श्री नारायण बोलते हैं कि ब्रह्मा जी ने गोलोक में जाकर मेरे मुखारविंद से निर्गत संपूर्ण विद्याओं की आदि देवी सती भारती को प्राप्त किया।" तो साथियों, आपको पता होगा कि मां सरस्वती का एक नाम भारती भी है और ये जो भारती देवी हैं, ये विष्णु जी के मुखारविंद से उत्पन्न हुई थीं जिनको ब्रह्मा जी ने प्राप्त किया। लेकिन फिर भी दोस्तों, अगर आपके मन में यह प्रश्न उठता है कि यह भारती देवी वो सरस्वती देवी नहीं हैं जिनकी पूजा हम ब्रह्मा जी के साथ करते हैं, ये कोई और देवी हो सकती हैं, तो इसके लिए हमें आगे के विवरण को भी पढ़ना पड़ेगा। यहीं पर उनको आगे 'वागेश्वरी' भी कहा गया है जिसका अर्थ होता है वाणी की देवी। और अगर आप आगे देखें तो उन्हें श्वेतवर्णा भी कहा गया है। उसी के आगे ये लिखा है कि उनके दो हाथों में वीणा और पुस्तक तथा अन्य हाथों में व्याख्या की मुद्रा देखी जाती थी। तो इस विवरण से स्पष्ट होता है कि ये वही सरस्वती देवी हैं जिनकी हम ब्रह्मा जी के साथ पूजा करते हैं, जो ब्रह्मा जी की पत्नी हैं और ये विष्णु जी के मुखारविंद से उत्पन्न हुई कृति हैं। तो यहां हमें यह बात समझ में आ गई कि जो ब्रह्मा जी की पत्नी सरस्वती देवी हैं वह विष्णु जी से उत्पन्न हुई हैं, ब्रह्मा जी से नहीं। वो विष्णु जी की कृति हैं।

अब दोस्तों, इस पूरे प्रकरण में एक जो इंपॉर्टेंट चीज आपको समझनी है वो ये कि जब ब्रह्मा जी के साकार रूप की परिकल्पना की गई तो किसी एक व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं दिखाई जाती है, ब्रह्मा जी एक से अधिक हैं। अगर आप उस प्रकरण को याद करें जहां हमने बताया था कि ब्रह्मा जी को जब अपनी ही कृति सरस्वती जी से काम-मोह हो गया था तब वहां पर उनके पुत्रों ने उनको समझाया था। वहां समझाते हुए मरीचि ने कहा था: 'पिताजी, आप समर्थ हैं फिर भी पुत्री-गमन जैसा दुस्तर पाप करने का संकल्प कर रहे हैं, ऐसा तो आपसे पूर्ववर्ती किसी भी ब्रह्मा ने नहीं किया और न आगे ही कोई करेगा।' तो आप साफ-साफ देख सकते हैं कि जिन ब्रह्मा जी की बात हो रही है उनसे भी पहले कई ब्रह्मा आए थे और उनके बाद भी कई ब्रह्मा आएंगे। तो ब्रह्मा जी एक नहीं हैं, बहुत सारे ब्रह्मा होते हैं। और इसी कारणवश हमें पुराणों में मल्टीवर्स का कांसेप्ट देखने को मिलता है।

ये स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मा जी एक नहीं हैं बल्कि अनेक ब्रह्मा हैं। इनफैक्ट, हर वो चीज जिसके अंदर सृजन करने की शक्ति होती है उसको ब्रह्म स्वरूप में देखा जाता है। और जब भी कोई नई रचना होती है तो उसके लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है इसलिए ब्रह्मा जी के साथ सरस्वती जी को जोड़ा जाता है। अब ब्रह्मा जी भी कई हैं तो कई तरह की सरस्वती जी भी होती हैं। अब किस ब्रह्मा जी की किस सरस्वती से संयुक्त दिखाया जाता है यह पौराणिक कथाओं के अनुसार बदलता रहता है।

अब बहुत से लोग यह भी आक्षेप लगाते हैं कि हिंदू सनातन धर्म के लोग पुराणों को कथा-कहानी बताकर हमेशा बचाते रहते हैं। ऐसा नहीं है, पुराणों में भी ज्ञान के भंडार हैं। जब मैं ये कहता हूं कि वेदों का ज्ञान लेकर उन पर कथाएं बनाई गईं जिससे जनसामान्य तक वो ज्ञान पहुंच सके, तो ये बात मैं अपने मन से नहीं कह रहा हूं। जो पुराण पढ़ेंगे उनको समझ में आ जाएगा क्योंकि जब ऋषि-मुनियों ने पुराणों को लिखा तो कथाओं के बीच-बीच में उन्होंने उस ज्ञान को पिरोया भी है जिससे आप कथाओं में भटक न जाएं। श्रीमद् भागवत महापुराण में इसी अध्याय में आगे बताया गया है कि ब्रह्मा जी शब्द-ब्रह्म स्वरूप हैं। वह वैखरी रूप से व्यक्त और ओंकार रूप से अव्यक्त हैं। तथा उनसे परे जो सर्वतः परिपूर्ण परब्रह्म है वही अनेक प्रकार की शक्तियों से विकसित होकर इंद्रधनुषीय रूपों में भासित हो रहा है। तो यहां पर आप देख सकते हैं कि जो सत्य वैदिक ज्ञान है वो भी पुराणों में आपको मिलता है।

ऐसे ही ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है - 'मनस्वरूपो ब्रह्मा मे ज्ञानरूपो महेश्वरः। वागधिष्ठात्री देवी या स्वयं सा सरस्वती॥' अर्थात मन ही ब्रह्मा है, ज्ञान ही महेश्वर है और वाणी की अधिष्ठात्री देवी ही स्वयं सरस्वती हैं। तो साथियों, हम देख सकते हैं कि पुराणों में जहां सबको एक स्वरूप दे दिया गया है, वहीं आपको बार-बार ये भी बता दिया जाता है जिससे आप भटकें नहीं कि ये सब शक्तियां हैं, ये मनुष्य रूप में नहीं हैं। इनका कोई मिथुन धर्म नहीं है कि ये संभोग करने लगें। ये शक्तियां हैं, ये परस्पर मिलती-जुलती रहती हैं।

इसीलिए बहुत सारे विद्वान समय-समय पर जन्म लेते रहते हैं और वो आपको इस विषय में बताते हैं। ऐसे ही एक विद्वान कुमारिल भट्ट थे (650 ईस्वी के आसपास)। उनको भी पता था कि भविष्य में ऐसे निर्बुद्धि लोग इस तरह के आक्षेप लगाएंगे, इसलिए उन्होंने अपने ग्रंथ 'तंत्रवार्तिक' में ब्रह्मा जी की एक बहुत सुंदर व्याख्या की है। वहां वो कहते हैं कि संसार का रक्षक होने के कारण सूर्य ही प्रजापति (ब्रह्मा) है। वह पौ फटने के समय उषा के पीछे-पीछे उदित हो जाता है। वह उषा सूर्य से ही उत्पन्न होती है अतः उसका पुत्रीवत वर्णन किया है। इस उषा में वह सूर्य अपना लाल किरण रूपी बीज डालता है जो उपचार से स्त्री-पुरुष संयोग की तरह कहा जाता है। अब दोस्तों, यहां देख सकते हैं कि पहले तो पुत्रीवत वर्णन है उषा का क्योंकि वो सूर्य से स्वयं प्रकट हो रही है, लेकिन फिर उषा के साथ जो सूर्य का संबंध है उसे उपचार के माध्यम से स्त्री-पुरुष के संयोग की तरह बताया गया है। 'उपचार' का अर्थ होता है मेटाफर (उपमा)। आपने उसको मेटाफर दे दिया और समझा दिया। अब इन दो मेटाफर्स को मिलाकर लोग उसका गंदा मजाक बना देते हैं और इसी तरह कंट्रोवर्सी जन्म लेती है।

इसी प्रकरण को लेकर पंडित माधवराचार्य शास्त्री जी कहते हैं कि ये जो पूरा प्रकरण है जिसमें ब्रह्मा जी अपनी ही कृति पर सम्मोहित हो उठे, इसका एक आध्यात्मिक अर्थ है और वह अर्थ यह है कि वाणी का अनुगमन करते हुए मन को विवेक बार-बार सावधान करता है। यही इस कथा का आध्यात्मिक अर्थ है जिससे मनोविज्ञान का एक अद्भुत रहस्य भी प्रकट होता है।

तो दोस्तों, मैं आशा करता हूं कि आज की प्रस्तुति के माध्यम से ब्रह्मा जी और सरस्वती जी के बीच के संबंध को लेकर जो प्रश्न उठते हैं, उनके उत्तर आपको मिल गए होंगे। अगर आपको ये आर्टिकल पसंद आई है तो अपने परिवारजनों और दोस्तों में जरूर साझा करें। जय श्री राम।

Post a Comment

0 Comments