सनातन धर्म किसी एक बंधी-बंधाई फिलॉसफी, एक किताब या किसी एक धर्मगुरु के निर्देशों से संचालित नहीं होता। यह सत्य की खोज का मार्ग है, जहाँ ईश्वर और आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए हजारों वर्षों में अनेक विद्वानों ने अलग-अलग मार्ग और जीवन शैलियाँ विकसित की हैं। यही कारण है कि सनातन धर्म में जहाँ एक ओर 'ब्रह्मचर्य' को सर्वोपरि माना गया है, वहीं दूसरी ओर 'कामसूत्र' जैसे ग्रंथों और मंदिरों की दीवारों पर कामक्रीड़ा के चित्रण भी दिखाई देते हैं।
इस विरोधाभास (Paradox) के पीछे का असली दर्शन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है? क्या वाकई सनातन धर्म में यौन सुख को अपराध माना गया है? आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
1. सनातन धर्म में 'काम' (यौन इच्छा) का मौलिक स्थान
मौलिक रूप से सनातन धर्म में यौन इच्छा या 'काम इच्छा' को कोई बुरी चीज या पाप नहीं माना गया है। यदि ऐसा होता, तो काम इच्छा के सगुण स्वरूप को 'कामासुर' कहा जाता, लेकिन हमारे यहाँ उन्हें 'कामदेव' (देवता) कहा गया है। इसके पीछे एक गहरा दर्शन छुपा हुआ है।
सृष्टि का आधार: भगवान की बनाई इस सृष्टि में यदि जीवों के मन में काम इच्छा उत्पन्न न हो, तो सृष्टि का चक्र आगे नहीं बढ़ सकता। इसीलिए इस इच्छा को दैवीय माना गया है, राक्षसी नहीं।
जीवन का लक्ष्य: सनातन जीवन पद्धति में मानव जीवन के जो चार सबसे बड़े पुरुषार्थ (लक्ष्य) निर्धारित किए गए हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—उनमें 'काम' को भी एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यह बाकी के तीनों लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मजबूती प्रदान करता है।
2. वैदिक काल में ब्रह्मचर्य और यौनाचार के नियम
अक्सर लोगों को लगता है कि हमारे धर्म में यौन सुख से वंचित करने का प्रयास किया गया है, लेकिन इसके लिए हमें वैदिक काल के सामाजिक ढांचे और आश्रम व्यवस्था को समझना होगा।
वैदिक काल में मनुष्य के जीवन को 25-25 वर्षों के चार आश्रमों में बांटा गया था, जिसमें सबसे पहला और महत्वपूर्ण था—ब्रह्मचर्य आश्रम।
गुरुकुल की कठिन दिनचर्या
ब्रह्मचर्य आश्रम में युवाओं को गणित, अर्थशास्त्र, कला, एस्ट्रोनॉमी, दर्शन और भाषा जैसे कठिन विषयों का अध्ययन करना होता था। साथ ही गुरु की सेवा और शास्त्रों पर वाद-विवाद करना होता था। इस बहुमूल्य समय में ध्यान भटके नहीं और ऊर्जा व्यर्थ न जाए, इसलिए इस काल में हर प्रकार के सांसारिक सुख (काम) का निषेध किया गया। संस्कृत में 'काम' का व्यापक अर्थ केवल सेक्स नहीं, बल्कि 'हर प्रकार के सांसारिक सुख का भोग' है। इसलिए आभूषणों, सौंदर्य सामग्रियों और वासना से दूर रहने को कहा गया, ताकि युवा अपने ज्ञान-अर्जन और करियर पर फोकस कर सकें।
वैज्ञानिक और सामाजिक कारण (गर्भनिरोधक का अभाव)
वैदिक काल में आज की तरह आधुनिक गर्भनिरोधक (Contraceptives) साधन उपलब्ध नहीं थे। यदि कम उम्र में कोई बालिका गर्भवती हो जाती, तो उसे भारी शारीरिक पीड़ा और सामाजिक ठेस पहुंचती। ब्रह्मचर्य पूर्ण होने के बाद ही बकायदा संस्कारों के साथ युवा 'गृहस्थाश्रम' में प्रवेश करते थे। इसलिए विवाह से पहले योनि संबंध (Pre-marital Sex) जैसी कोई जीवन शैली या सिस्टम उस समय नहीं था, और गुरु तथा अभिभावक बच्चों की सुरक्षा के लिए ब्रह्मचर्य का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करते थे।
3. काम इच्छा से दूर रहने के 8 उपाय
वैदिक ऋषियों और गुरुओं ने युवाओं को काम वासना से दूर रहने और अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहने के लिए आठ मुख्य उपाय बताए थे:
- स्मरण: अपनी स्मृति को शुद्ध रखना और ख्यालों में भी वासना के बारे में न सोचना।
- कीर्तन: मित्रों के बीच वासना से जुड़े विषयों पर चर्चा, कहानियाँ या चित्रण न करना।
- क्रीड़ा: ऐसे सभी आचरणों और स्पर्श से दूर रहना जिससे भीतर काम इच्छा जाग्रत हो।
- प्रेक्षण: किसी की भी तरफ कामुक या वासना भरी दृष्टि से न देखना।
- भाषण: किसी से एकांत या चोरी-छुपे कामुक बातें न करना।
- संकल्प: मानसिक रूप से मजबूत बनना कि मुझे अपने नियमों का पालन करना है।
- अध्ययन: काम इच्छा को जीवन का मुख्य ध्येय न बनने देना, बल्कि विद्या पर ध्यान लगाना।
- क्रिया निवृत्ति: किसी भी प्रकार की शारीरिक यौन क्रिया में प्रवृत्त न होना।
4. कामसूत्र ग्रंथ की रचना क्यों की गई?
यदि काम इच्छा को केवल संतानोत्पत्ति का साधन माना जाता, तो महर्षि वात्स्यायन को 'कामसूत्र' जैसा ग्रंथ लिखने की क्या आवश्यकता थी?
एक सामाजिक और वैज्ञानिक ग्रंथ: विद्वानों के अनुसार, कामसूत्र मुख्य रूप से प्रेम और सामाजिक व्यवहार पर लिखा गया सूत्र है। इस ग्रंथ में कुल सात भाग (Parts) हैं, जिनमें से केवल एक भाग में यौन आसनों (Postures/Positions) का वर्णन है। बाकी के छह भागों में सामाजिक व्यवहार और प्रेम कला पर बात की गई है।
यौन शिक्षा की आवश्यकता: महर्षि वात्स्यायन का दृष्टिकोण वैज्ञानिक था। उनका मानना था कि नर और नारी के बीच का संबंध दोनों की समझ पर निर्भर करता है, इसलिए उन्हें इसकी सही शिक्षा मिलना आवश्यक है। यदि सही जोड़े में, सही विचारों के साथ यह संबंध न बने, तो यौन सुख नहीं मिलता और यह क्रिया विकृत रूप भी ले सकती है।
कामसूत्र की चेतावनी: ग्रंथ के अंत में वात्स्यायन जी स्पष्ट करते हैं कि काम का स्थान पुरुषार्थों में सबसे नीचे (धर्म और अर्थ के बाद) आता है। यदि काम इच्छा के कारण आपके 'धर्म' और 'अर्थ' की हानि हो रही है, तो ऐसी काम इच्छा का तुरंत त्याग कर देना चाहिए।
5. मंदिरों की दीवारों पर कामक्रीड़ा के चित्रण का रहस्य
भारतवर्ष में खजुराहो जैसे सैकड़ो मंदिर रहे हैं (विशेषकर मुगलों और विदेशी आक्रांताओं के हमलों से पहले), जिनकी बाहरी दीवारों पर कामक्रीड़ा को प्रदर्शित करती मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। इस एक्सप्लिसिट आर्ट (Explicit Art) के पीछे इतिहासकारों और विद्वानों के विभिन्न मत हैं:
सांसारिक मोह का त्याग: कुछ विद्वानों का मानना है कि ये मूर्तियाँ सांसारिक मोह-माया को दर्शाती हैं। यह भक्त को संकेत देती हैं कि मंदिर (ईश्वर के गर्भगृह) में प्रवेश करने से पहले अपनी समस्त सांसारिक वासनाओं को बाहर ही छोड़ दें।
यौन शिक्षा (Sex Education): कुछ लोग इसे प्राचीन समय में समाज को यौन शिक्षा देने का माध्यम मानते हैं, हालांकि यह मत पूरी तरह सटीक नहीं बैठता क्योंकि दीवारों पर कुछ ऐसे आसन भी चित्रित हैं जो कामसूत्र में वर्जित हैं।
प्रकृति और पुरुष का मिलन: उपनिषदों (जैसे बृहदारण्यक उपनिषद) और सांख्य योग के अनुसार, जब पुरुष और प्रकृति एक दूसरे में विलीन होते हैं, तो वे अपनी व्यक्तिगत पहचान भूल जाते हैं। इस अद्वैत और सृष्टि निर्माण की फिलॉसफी को दर्शाने के लिए भी यह चित्रण किया गया।
चारों पुरुषार्थों का संतुलन (सबसे सटीक मत): चूंकि मंदिर सनातन समाज के केंद्र बिंदु थे, इसलिए वहाँ जीवन के चारों आयामों को दर्शाया गया। मंदिर में 'धर्म' के लिए ईश्वर की मूर्ति है, 'अर्थ' के लिए सोने-चांदी के आभूषण और ऐश्वर्य का संग्रहण है, और इसी तरह जीवन के भोग को दर्शाने के लिए 'काम' का शिल्प कला के माध्यम से चित्रण किया गया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह चित्रण पूरी दीवारों पर नहीं, बल्कि केवल 5% से 15% हिस्से में ही है; बाकी हिस्सों में अन्य सामाजिक गतिविधियाँ जैसे स्त्री का श्रृंगार या धन कमाना आदि दिखाया गया है। इन तीनों (धर्म, अर्थ, काम) के सही संतुलन से ही 'मोक्ष' की प्राप्ति संभव है।
निष्कर्ष: क्या सही है और क्या गलत?
सनातन धर्म के अनुसार, यौन सुख भोगना कोई अपराध नहीं है, बशर्ते उसकी एक सही मर्यादा और स्थान हो। काम का स्थान हमेशा 'धर्म' और 'अर्थ' के नीचे होना चाहिए।
गलत क्या है? यदि आप धन (अर्थ) का दुरुपयोग करके काम वासना पूरी करते हैं, तो वह गलत है। यदि कोई राजा या जिम्मेदार व्यक्ति अपने कर्तव्यों (धर्म) को छोड़कर कामुकता में लिप्त रहता है, तो वह अधर्म है। यदि कोई छात्र अपनी पढ़ाई छोड़कर केवल वासना में डूबा रहता है, तो वह भी गलत है।
सही क्या है? जब आप अपनी धर्मपत्नी के साथ संतानोत्पत्ति या प्रेम के लिए संबंध बनाते हैं, तब धर्म और अर्थ का नाश नहीं होता। ऐसे संतुलित और मर्यादित संबंध को सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी माना गया है।

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