इस दुनिया में अगर कोई सच में भक्ति ज्ञान और कर्म इन तीनों मार्गो पर लगातार बाढ़ रहे हैं तो वह इस विश्व के साइंटिस्ट उनके विज्ञान के प्रति अटूट भक्ति ज्ञान प्रताप की जिज्ञासा और सांसारिक बंदों से मुक्ति उन्हें किसी योगी से कम नहीं बनाते। मनुष्य सदियों से सब कुछ जानना छह रहा है। सदियों पहले जब टेक्नोलॉजी नहीं थी तो मनुष्य ने इमेजिनेशन, लॉजिक और फिलासफी का प्रयोग किया, जिसने आगे चलकर धर्म का रूप धरण कर लिया। अब धर्म की जादौन में तो क्यूरोसिटी ही थी अपने अस्तित्व को समझना की, पर सदियों बात आज धर्म की कुछ टहनियां अंधविश्वास, पाखंड और सांप्रदायिकता की तरफ झुक गई हैं। ऐसे में विज्ञान ही वह ए रही है, जिससे इन टहनियां को कैट छांट कर धर्म की दूसरी टहनियां को बचाया जा सकता है, जो सच में हमें अपने अस्तित्व के करण की और ले जाति हैं।
वैज्ञानिक प्रगति की ही बदौलत आज हम अपने सनातन मूल ग्रंथों को जब पढ़ने हैं तो और भी हम गहराई में उतार कर देख पाते हैं की कहीं ना कहीं हमारे पूर्वज आज से हजारों वर्षों पहले भी ऐसे ही एडवांस इमेजिनेशन रखते थे। हम कहने को यह भी कह सकते हैं की सिर्फ इमेजिनेशन ही तो थी, सोने में कौन सी बड़ी बात है और ग्रंथों में कौन से मेडिकल प्रोसेस अवेलेबल हैं, लेकिन आज से हजारों वर्षों पूर्व मल्टीवर्स और टाइम दिलेशन जैसी बातों की कल्पना करना मात्र भी अपने आप में उतनी ही रिवॉल्यूशनरी बात रही होगी जितनी आज बिग बैंग थ्योरी है। जब बाकी दुनिया यह सोच रही थी की पूरा ब्रह्मांड चार से पांच हजार साल पहले बना होगा, उस समय हमारे विद्वान ऋषि इन्फिनिटी और शून्य के कॉन्सेप्ट से खेल रहे थे।
नमस्ते दोस्तों, आप सभी का स्वागत है। आज हम लोग एक बहुत ही मिस्टीरियस और इंटरेस्टिंग चरित्र कागभुशुण्डि जी के बारे में बात करेंगे और यह भी जानेंगे की कैसे उनकी कथाओं के माध्यम से हमारे पूर्वजों ने ऐसी-ऐसी बातें हमें बताई हैं, जो आज हम विज्ञान के बदौलत और भी अच्छे से समझ पा रहे हैं। तो दोस्तों, बिना किसी विलंब के आज के विश्लेषण को प्रारंभ करते हैं।
कागभुशुण्डि कौन थे?
सबसे पहले हम समझ लेते हैं की कागभुशुण्डि कौन थे और फिर उनके द्वारा सुनाई गई विचित्र कथाओं में जो छुपे रहस्य हैं उनको भी हम जानेंगे। कागभुशुण्डि जी का वर्णन वाल्मीकि रामायण और श्री रामचरितमानस दोनों ग्रंथों में हुआ है, पर अगर योग वशिष्ठ को देखें तो वहां पर उन पर कई अध्याय हैं। उनका नाम हमें बहुत ही इंटरेस्टिंग लगता है—काग और भुशुण्डि। 'काग' का मतलब होता है कौवा और 'भुशुण्डि' का अर्थ लिया जाता है एक पौराणिक अग्निशस्त्र से; एक तरह का यह हथियार होता था। आप अगर धनुर्वेद में भी देखें तो वहां पर 100 से भी ज्यादा हथियारों के बारे में बताया गया है और वहां पर एक हथियार था 'भुशुण्डि', जो की अग्नि से जुड़ा हुआ हथियार माना जाता था।
कागभुशुण्डि जी हमेशा से कौवे के रूप में नहीं थे। उनका कौवे के रूप में बनना और फिर इस रूप में बने रहना, इसके पीछे एक कथा है और उसे कथा को सबसे पहले हम जान लेते हैं। साथियों, कागभुशुण्डि जी भगवान शिव के अनन्या भक्त थे। वो शिव भक्ति में ही लीन रहते थे और उनको अन्य किसी देवता में कोई आसक्ति नहीं थी। एक दिन जब उनके गुरु का आगमन हुआ तो शिव उपासना के समय वो अपने गुरु का अभिवादन करना भूल गए और इस बात से शिवजी क्रुद्ध हो गए, क्योंकि शिवजी बताना चाहते थे की जो गुरु का स्थल है, जो गुरु का सम्मान है, वो एक भगवान की तरह होता है। आप कितनी भी पूजा पाठ करें, लेकिन गुरु का सम्मान हमेशा होना चाहिए। तो इस वजह से शिवजी क्रोधित होकर कागभुशुण्डि जी को एक श्राप दे देते हैं। श्राप के अनुसार कागभुशुण्डि जी को अगले हजार जन्म पशु योनि में जीने थे।
इस श्राप को सुनने के बाद जो कागभुशुण्डि जी के गुरु थे, उन्होंने शिवजी से बहुत विनती और प्रार्थना की की इस श्राप को वो वापस ले लें। शिवजी श्राप को वापस तो नहीं ले सकते थे, लेकिन कागभुशुण्डि जी के गुरु की प्रार्थना को देखते हुए उन्होंने बोला की ये जरूर 1000 जन्म तक पशु योनि में जिएंगे, लेकिन 1000 जन्म के बाद ये मनुष्य योनि में एक विद्वान पुरुष बनेंगे और भगवान राम की भक्ति को प्राप्त करेंगे।
अब 1000 जन्मों को पशु योनि में जीने के बाद जब कागभुशुण्डि जी ब्राह्मण रूप में पैदा होते हैं, तो अलग-अलग तरह के प्रवचनों में जाया करते थे। एक प्रवचन चल रहा था लोमश ऋषि का, वहां पर वो समझा रहे थे की कैसे निर्गुण भक्ति सगुण भक्ति से भी ऊपर है। पर यह बात कागभुशुण्डि जी को पसंद नहीं आई और वहां पर उन्होंने लोमश ऋषि से बहस और विवाद करना शुरू कर दिया। इस बात से उन्होंने लोमश ऋषि को क्रोधित कर दिया और लोमश ऋषि ने कागभुशुण्डि जी को यह श्राप दे दिया की वो कौवा बन जाएं। लेकिन जब बाद में लोमश ऋषि को अपने श्राप पर पश्चाताप हुआ तो उन्होंने कागभुशुण्डि जी को इच्छा मृत्यु का वरदान भी दे दिया। अब चूंकि कौवे के रूप में ही कागभुशुण्डि जी को भगवान श्री राम का स्पर्श प्राप्त हुआ था, तो इस वजह से उनको इस शरीर से प्रेम हो गया और फिर वो आजीवन, जब तक उनकी इच्छा नहीं हुई, वो कौवे के ही रूप में बने रहे और जगह-जगह जाकर राम कथा का वाचन करने लगे।
चूंकि कागभुशुण्डि जी अनगिनत वर्षों तक जीवित रहे, तो ऐसा माना जाता है की उन्होंने रामायण को 11 बार और महाभारत को 16 बार देखा था और हर बार इन घटनाओं का परिणाम कुछ अलग ही था। इसी कारण से कागभुशुण्डि जी की जितनी भी कथाएं हैं, वो बहुत इंटरेस्टिंग हैं। अगर उनको मॉडर्न साइंस के पर्सपेक्टिव से पढ़ा जाए और समझा जाए, तो हमें बहुत ढेर सारी मॉडर्न थ्योरीज देखने को मिलती हैं। मोस्टली ये कथाएं आपको योगवाशिष्ठ में पढ़ने को मिल जाएंगी, जो अपने आप में बहुत ढेर सारे कॉन्सेप्ट जैसे टाइम दिलेशन, मल्टीवर्स, क्वांटम फिजिक्स जैसे कॉन्सेप्ट को अपने अंदर समेटे हुए हैं।
योगवाशिष्ठ और आधुनिक विज्ञान
अब कागभुशुण्डि जी द्वारा सुनाई गई विचित्र कथाओं की स्टडी करते हैं। योगवाशिष्ठ ग्रंथ के निर्वाण प्रकरण के उत्तरा में 13वें सर्ग में कथा बताई गई है, जहां पर कागभुशुण्डि जी एक विद्याधर नामक व्यक्ति को इंद्र की एक कथा सुना रहे हैं। अगर आपके पास गीता प्रेस प्रकाशन की योगवाशिष्ठ है तो आप उसमें 463 पेज नंबर पर इस कथा को पढ़ सकते हैं। इस कथा में हमारे यूनिवर्स की बहुत ढेर सारी इंटरेस्टिंग चीजें दी गई हैं, जैसे की यहां पर बताया गया है की जब इंद्र असुरों से परास्त होने के बाद एक नए लोक में चले जाते हैं, तो वहां पर समय बहुत अलग तरह से व्यवहार करता है। अगर यही बात हम 100-150 साल पहले या फिर आइंस्टीन जी के 'थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी' देने से पहले पढ़ते, तो हम समझ ही ना पाते।
कथा के प्रारंभ में ही छठे श्लोक में कागभुशुण्डि जी हमारे ब्रह्मांड के विषय में एक बहुत रुचिकर बात कहते हैं। वो वहां पर कहते हैं की—"कभी कहानी किसी एक कल्पवृक्ष में, सब तरह की कल्पनाओं के आधारभूत, माया सबल ब्रह्म में, युग की संधि रूप शाखा में, ब्रह्मांड रूपी गूलर का फूल प्रकट हुआ।"
इस लाइन का एक-एक शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। सबसे पहले कागभुशुण्डि जी कह रहे हैं की 'कभी' और 'कहानी'। 'कभी कहानी' इस बात का प्रमाण है की हमें नहीं पता है की वो कौन सा समय था या फिर वो कौन सी जगह थी जहां पर ये ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ। चूंकि समय और स्पेस—यानी टाइम और स्पेस—एब्सलूट नहीं हैं, ये फ्रेम ऑफ रेफरेंस पर डिपेंड करते हैं, इसलिए कागभुशुण्डि जी यहां पर पहले ही बोल दे रहे हैं की 'कभी' और 'कहानी' फ्रेम ऑफ रेफरेंस पर डिपेंड करेगा।
न्यूटन ने प्रूफ किया था की स्पेस एब्सलूट नहीं है, लेकिन वो समय को एब्सलूट मानते थे। इस बात को बाद में आइंस्टीन जी ने तोड़ा। उन्होंने 'थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी' में प्रूफ किया की प्रकाश की चाल को मैच करने के लिए समय को अपने आप को घटाना या बढ़ाना पड़ता है। ये दोनों चीजें, टाइम और स्पेस, एब्सलूट नहीं हैं, रिलेटिव हैं।
आगे कागभुशुण्डि जी बोलते हैं—'किसी एक कल्पवृक्ष में'। सृष्टि की तुलना कल्पवृक्ष से की गई है। 'कल्प' का अर्थ समर्थ के लिए प्रयोग में लाया जाता है। साथ ही 'किसी एक' का मतलब यह इंडिकेट कर रहा है की बहुत ढेर सारे कल्पवृक्ष हो सकते हैं। यानी सृष्टि भी एक नहीं है, कई ढेर सारी सृष्टियां हैं। ब्रह्मांड उसका एक भाग है।
वे आगे कहते हैं—'युग की संधि रूपी शाखा में ब्रह्मांड रूपी एक गूलर का फल प्रकट हुआ'। ब्रह्मांड को फल बोलना इस बात का संकेत है की ब्रह्मांड अकेला नहीं है। एक सृष्टि में कई ब्रह्मांड हो सकते हैं क्योंकि एक पेड़ पर एक फल तो लगता नहीं, अलग-अलग शाखाओं में अलग-अलग फल लग सकते हैं। अलग-अलग शाखाएं अलग-अलग टाइमलाइन को दिखाती हैं। गूलर का फल परफेक्ट स्फीयर होता है, और साइंटिस्ट ने पाया है की हमारे ब्रह्मांड का 'कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन' (CMB) चारों तरफ से होमोजीनियस है। इसे हम एक परफेक्ट स्फीयर मानते हैं जिसकी रेडियस 46.5 बिलियन लाइट इयर्स है।
होलोग्राफिक यूनिवर्स और अंतिम निष्कर्ष
कथा में आगे इंद्र असुरों से युद्ध में हारने के बाद स्वयं को एक 'अणु' रूप में परिवर्तित कर सूर्य के प्रकाश में स्थापित कर देते हैं। वहां, 18वें और 19वें श्लोक में कहा गया है—"अत्यंत अणु बनकर बाहर सूर्य के किरणों के कोश में स्थित किसी एक त्रसरेणु के अपने संविदा रूप प्रवेश संकल्प से ऐसे प्रविष्टि हो गया जैसे पद्मकोष के भीतर मधुकर प्रविष्टि हो जाता है।" 'त्रसरेणु' का अर्थ यहाँ फोटोन हो सकता है। जो भी वस्तु प्रकाश की वेग से चलती है, उसके लिए समय रुक जाता है। इंद्र के साथ भी यही हुआ—समय रुक गया और वो पुरानी चीजें भूल गए।
होलोग्राफिक यूनिवर्स के बारे में भी हमें 7वें और 8वें सर्ग में कागभुशुण्डि जी की कथा के माध्यम से पता चलता है। कागभुशुण्डि जी विद्याधर को बताते हैं की जिस कल्पवृक्ष की मैंने बात की है, जिस सृष्टि की बात की है, वो बस प्रतिमान है। वो एक अहंकार रूपी बीज से प्रकाशित होता हुआ प्रतीत हो रहा है, उसमें सत्य जैसा कुछ भी नहीं है। 7वें सर्ग में कागभुशुण्डि जी ने इस सृष्टि को 'दृश्य प्रपंच' बोला है। उन्होंने बताया है की जैसे रेगिस्तान में जल दिखने पर भी वास्तव में जल नहीं होता, इस प्रकार सारा विश्व अवास्त रूप होने के कारण, असत्य होने से असत ही है।
निष्कर्ष यह है की यह 'वृक्ष रूपी' थ्योरी वेद सम्मत है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 164वें सूक्त के 20वें मंत्र में पूरी सृष्टि को वृक्ष रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। यह सब ज्ञान भले हमें कागभुशुण्डि जी की कथाओं से मिल रहा हो, लेकिन यह ज्ञान उतरा वेदों से ही है।
जय श्री राम।

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